National Herald case: पहले ही मान लेते पूर्व ED अधिकारी हिमांशु लाल की बात तो कोर्ट से ना लगता 12 साल बाद झटका

National Herald case:नेशनल हेराल्ड मामले में कोर्ट ने ईडी की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए कहा कि इस केस की जांच बगैर एफआईआर दर्ज किए की जा रही है, जो तकनीकी रूप से सही नहीं है। ऐसे में कोर्ट से राहुल और सोनिया गांधी समेत अन्य आरोपियों को बड़ी राहत मिल गई है। अब इस मामले में नई एफआईआर दर्ज करने की बात की जा रही है। बता दें कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 2012 में इस मामले में की गई शिकायत पर तत्कालीन ईडी अधिकारी और पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर हिमांशु कुमार लाल ने उसी वक्त सीबीआई को चिट्ठी लिखकर एफआईआर दर्ज करने का निवेदन किया था। उन्होंने कहा था कि जब तक इस केस में एफआईआर नहीं होती, तब तक तकनीकी रूप से ईडी के हाथ में बहुत कुछ नहीं होगा। अब 2 दिन पहले जब कोर्ट का फैसला आया तो हिमांशु कुमार की वो बातें याद आ रही हैं। अब इस मामले में नई एफआईआर दर्ज करने की तैयारी है। अगर उसी वक्त हिमांशु कुमार लाल की बात मान ली जाती तो शायद कोर्ट से ईडी को झटका नहीं लगता और उसके 12 साल जांच में यूं ही बर्बाद नहीं होते, जिसमें लाखों रुपये भी खर्च हुए।
क्या है नेशनल हेराल्ड मामला
यह एक लंबे समय से चल रहा विवाद है, जो मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी द्वारा नेशनल हेराल्ड अखबार की प्रकाशक कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) की संपत्तियों के कथित दुरुपयोग और यंग इंडियन लिमिटेड (YIL) नामक कंपनी के माध्यम से इन संपत्तियों के हस्तांतरण से जुड़ा है। ईडी सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत पर जांच कर रही है।
जानें क्या हैं मुख्य आरोप
•नेशनल हेराल्ड अखबार की स्थापना 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर की थी।
•2008 में अखबार का प्रकाशन बंद हो गया और AJL पर कांग्रेस पार्टी का लगभग 90 करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त कर्ज था।
•2010 में यंग इंडियन (YIL) नामक एक नई कंपनी बनाई गई, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास 76% शेयर (38-38%) थे।
•आरोप है कि कांग्रेस ने 90 करोड़ का कर्ज माफ कर AJL की संपत्तियां (दिल्ली, लखनऊ आदि में मूल्यवान रियल एस्टेट, अनुमानित 2000 करोड़ रुपये से अधिक) मात्र 50 लाख रुपये में YIL को ट्रांसफर कर दीं।
•यह धोखाधड़ी, विश्वासघात, आपराधिक साजिश और संपत्ति की हेराफेरी का मामला बताया जाता है।
कहां से हुई मामले की शुरुआत:
•2012 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की एक अदालत में निजी शिकायत दर्ज की।
•2014 में अदालत ने संज्ञान लिया और सोनिया, राहुल आदि को समन जारी किया।
•ED ने 2014 में मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत जांच शुरू की, लेकिन बिना किसी पुलिस FIR (प्रेडिकेट ऑफेंस) के।
बिना FIR के ED करती रही जांच 
•PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग जांच के लिए एक “शेड्यूल्ड ऑफेंस” (जैसे धोखाधड़ी, विश्वासघात) की पुलिस FIR जरूरी होती है।
•यहां केवल स्वामी की निजी शिकायत थी, कोई सरकारी FIR नहीं।
•“ तत्कालीन ED अधिकारी हिमांशु कुमार लाल ने नेशनल हेराल्ड मामले CBI को उसी वक्त पत्र लिखकर FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी। मगर उनकी सिफ़ारिश पर गौर नहीं किया गया। इसके बाद ED स्वामी की शिकायत पर ही जांच करती रही और उसी आधार पर चार्जशीट फाइल कर दिया। मगर कोर्ट ने बगैर FIR चार्जशीट को तकनीकी रूप से ग़लत माना। पूर्व में हिमांशु लाल ने भी बग़ैर FIR केस को तकनीकी रूप से कमजोर बताया था, जिसे उस समय नज़रअंदाज़ कर दिया गया था।
•फिर भी ED ने जांच जारी रखी, संपत्तियां अटैच कीं और 2025 में चार्जशीट दाखिल की।
अब क्या हुआ
•अक्टूबर 2025 में ED की शिकायत पर दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने नई FIR दर्ज की। इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और संपत्ति में हेराफेरी का आरोप लगाया गया।
•16 दिसंबर 2025 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने ED की पुरानी चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह बिना FIR के आधारित थी। कोर्ट ने कहा कि जांच ही गैरकानूनी थी।
•हालांकि, नई FIR के आधार पर ED आगे जांच कर सकती है और नई चार्जशीट दाखिल करने की योजना बना रही है।

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